Saturday, March 19, 2011

Daman Dil Ka



सांस  बह  रही  है  टूट  कर  
कतरा  कतरा 
किस  धारा  से  मिल  रही  
जीवन  की  या  वक़्त  की 
मगर  वो  खुद  ही  बह  रहे  दोनों , टूट  कर 
कतरा  कतरा 

वक़्त  से  पल  गिर  रहे  
जीवन  से  ज़िन्दगी  छूट  रही 

किस  में  गिर  रहे  दोनों 
किस  में  मिल  रहे 

कौनसी  है  वो  झोली  जो,
समेट  रही  इन  कतरों  को  

चेतन  सत्ता  का  कोई  आंचल  
कहाँ  है  इतना  गहरा 

व्योम  का  कोई  आधार  नहीं  
जो  संभाल  ले  इन  कतरों  को 

मगर  शायद  इक  दुनिया  है  
एक  आधार  जिसे  है  स्वीकार 
साँसों  का  टूटना  
पलों  का  गिरना 
ज़िन्दगी  का  छूटना 

हाँ 
वो  कायेनात  है  दिल  की 
वो  दामन  है दिल का 
दिल -- जो नाम  है  सहज  स्वीकृति  का  
चेतन  अवचेतन  के  तानो  से  बुना 
हाँ  ये  दामन  दिल  का ....! 

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