Friday, December 24, 2010

khushiyon ke phool


तलाशो  तो  दो  जहाँ  खुद  में  हैं ...
नहीं  तो  कायेनात  भी  झूठी  है .. !! 

भ्रम  है  कि  खुशियाँ  सामने  किसी  मोड़  पे   खड़ी  हैं 
झांको  ज़रा  जो  अपने  दिल  में  ये  कलियाँ  तो  वही  खिली  हैं 

चाहते  हो  कोई  आये  और  दामन  मुस्कानों  से  भर  दे ....
ज़रा  गिरेबान  में  तो  देखो  ये  करम तुमने  कितनो  पे  किया  है .....?

आकांक्षाएं  अपेक्षाएं  बहुत  आसान  राहें  हैं  दिल  बहलाने  कि 
ज़रा  इनपे  उतर  के  तो  देखो  दिल  से  लहू  निचोड़  लेती  हैं 

सुनते  आये  हैं  बुजुर्गो  से  जो  दोगे  सो  पाओगे 
गर  गम  देखते  हो  दमन में  तो  समझ  लो  क्या  दिया  था  तुमने ...!

इक  बार  तो  सब  कुछ  भुला  के  सिर्फ  अपने  लिए  मुस्कुराओ ...
इक  बार  अपनी  मेहनत  से  किसी  के  होंटों  पे  तो  मुस्कान  लाओ ...

दिल  कि  कलियों  को  मुस्कानों  के  फूल  बन  जहाँ  को  महकाने  तो  दो 
जीवन  तुम्हारा  भी  खुशियों का चमन  होगा ...!

5 comments:

  1. खुद को कौन देखता है ?
    बहुत अच्छी रचना !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  2. ghar se masjid hai bahut door chalo yu.n kar le.n,
    kisi rote huey bachche ko ha.nsaayaa jaaye.

    bahut khoobsoorat vichaar.bahut pyaar bharee rachnaa.

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  3. बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

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  4. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह कविता रची है आपने।

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  5. बहुत अच्छी रचना|

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