Thursday, November 4, 2010

काहे रे मनवा 
काहे तू अकुलाई 

भ्रम्रौ की प्रीत का कदै पुष्प है पायी  
मधु रस को प्यासों तो 
पान करी उरी जाई
का जानै प्रेम प्यार   मा
कैसन है गहरायी  

काहे रे मनवा 
काहे तू अकुलाई 

बदरा सु का कदै प्रीत लगाल जाई 
आवारा सो है जिसको सुभायी
इहाँ उहाँ भटकत फिरत है 
जहाँ थामे दे मेह बरसाई  
का जानै प्रेम प्यार  मा 
कैसन है गहरायी  

काहे रे मनवा काहे तू अकुलाई 

काहे प्रीत तू जोड़े से 
जो पवन सा बही जाई 
ठौर  सहलाई कदै
कदै परायी ठौर चली जाई
का जानै प्रेम प्यार मा
कैसन है गहरायी  

काहे रे मनवा  
काहे तू अकुलाई 

 तोहरी प्रीत  तो ज्यूँ  वृक्ष कदम्ब को
भटकता ने छांह दे जाई 
नेह पुष्पं को बिछौना कर
क्लांत मन ने विश्राम दे जाई
तोहरे पवन पवित प्रेम सू
वाको मनन सीतल होई जाई

ना रे मनवा 
ना हो विकल तू 
आपण प्रेम को दीप सदा तू 
राखी हों जराई....!

2 comments:

  1. वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
    आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
    बधाई.

    ReplyDelete
  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

    ReplyDelete